आइये जानते है योग, धर्म और विज्ञान को-HaryanaTv1
योग के अतिरिक्त जीवन के परम सत्य तक पहुंचने का कोई उपाय नहीं है। जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात है कि योग विज्ञान है, विश्वास नहीं।
योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के 'विश्वासों' , किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है।
विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, की अपेक्षा करता है। विज्ञान मान्यता से शुरू नहीं होता; विज्ञान खोज से, अन्वेषण से शुरू होता है। वैसे ही योग भी खोज, जिज्ञासा, अन्वेषण से शुरू होता है। इसलिए योग के लिए सिर्फ प्रयोग करने की शक्ति की आवश्यकता है
प्रयोग करने की सामर्थ्य की आवश्यकता है, खोज के साहस की जरूरत है। विज्ञान कहता है, करो, देखो। विज्ञान चूंकि वास्तविक सत्य हैं, इसलिए श्रद्धाओं की उसे जरूरत नहीं ।दो और दो चार होते हैं, माने नहीं जाते। योग का पहला सूत्र है कि जीवन ऊर्जा,शक्ति है।
बहुत समय तक विज्ञान इस संबंध में राजी नहीं था और सोचता था: जगत पदार्थ है, मैटर है। लेकिन योग ने विज्ञान की खोजों से हजारों वर्ष पूर्व से यह घोषणा कर रखी थी। कि पदार्थ एक असत्य है, एक झूठ है, एक इल्यूजन है, एक भ्रम है। भ्रम का मतलब यह नहीं है कि 'नहीं है'।
भ्रम का मतलब.. जैसा दिखाई पड़ता है वैसा नहीं है।योग एक शुद्ध विज्ञान है। और जहाँ तक योग के संसार का सवाल है महर्षि पतंजलि का नाम महानतम है। वे एक दुर्लभ व्यक्ति हैं। मानवता के इतिहास में पहली बार इस व्यक्ति ने धर्म को विज्ञानं की हैसियत तक पहुंचा दिया।
उन्होंने धर्म को विज्ञानं का रूप दे दिया; शुद्ध नियम, किसी मान्यता की आवश्यकता नहीं। पतंजलि बुद्ध पुरुषों के जगत में महानतम है। उनके पास एक तेज वैज्ञानिक मन के जैसी पहुँच है और वैसा ही मनोभाव है। वे वस्तुत एक वैज्ञानिक हैं जो नियमों कि दृष्टि से सोचते हैं।
और उन्होंने मानवता के परम नियमों का निष्कर्ष निकाल लिया है, मानव मन और वास्तविकता की अंतिम कार्य संरचना का भी। वे बिलकुल एक गणित के सूत्र की तरह सटीक हैं। केवल वह जो बोल रहें हैं उसका पालन करो और परिणाम निश्चित घटित होगा।
जैसे तुम पानी को सौ डिग्री तक गर्म करो और वह भाप बन जाए। इसमें किसी मान्यता की आवश्यकता नहीं, तुम केवल इसे करते हो और समझ जाते हो। यह कर के समझने जैसा है। जहाँ तक मान्यता का सवाल है योग के पास कुछ भी नहीं है; योग कुछ भी मानने को नही कहता।
योग कहता है "अनुभव करो।" जैसे कि विज्ञानं कहता है " प्रयोग करो"। प्रयोग करना और अनुभव करना दोनों एक ही हैं; उनकी दिशाएं भिन्न हैं। प्रयोग का अर्थ है कि तुम कुछ बाहर कर सकते हो; अनुभव का अर्थ है ।कि तुम कुछ भीतर कर सकते हो।
अनुभव एक भीतरी प्रयोग है। विज्ञानं कहता है " विश्वास मत करो, जितना हो सके उतना संदेह करो," किन्तु साथ ही अविश्वास मत करो"- क्योंकि अविश्वास भी एक तरह का विशवास है। तुम ईश्वर में विश्वास कर सकते हो, तुम ईश्वर के न होने के सिद्धांत में भी विश्वास कर सकते हो।
तुम जितने कट्टर मनोभाव से ईश्वर को स्वीकार कर सकते हो, तुम इसके बिलकुल विपरीत भी बोल सकते हो, कि ईश्वर नहीं है। आस्तिक और नास्तिक दोनों ही विश्वासी होतें हैं, और विश्वास विज्ञान का क्षेत्र नहीं है। विज्ञान का अर्थ है किसी बात को अनुभव करना।
वह जो है उस पर प्रयोग करना और सत्य जानना यहाँ आस्था की बात ही नही । योग की भाषा में मनुष्य एक लघु ब्रह्मांड है। सूक्ष्म ढंग से मनुष्य एक छोटा सा ब्रह्मांड है, मनुष्य छोटे अस्तित्व में सघन रूप से समाया हुआ है। ब्रह्मांड का जो संपूर्ण अस्तित्व है, और कुछ नहीं मनुष्य का विस्तार ही है।
यह योग की भाषा है : लघु ब्रह्मांड व संपूर्ण ब्रह्मांड । जो कुछ बाहर अस्तित्व रखता है, ठीक वही मनुष्य के भीतर भी अस्तित्व रखता है। बाहर के सूर्य की भाँति मनुष्य के भीतर भी सूर्य छिपा हुआ है।बाहर के चाँद की ही भाँति मनुष्य के भीतर भी चाँद छिपा हुआ है।
और पंतजलि अंतर्जगत के आंतरिक व्यक्तित्व का संपूर्ण भूगोल हमें दे देना चाहते हैं। वे कहते किसूर्य पर संयम संपन्न करने से सौर ज्ञान की उपलब्धि होती है। तो उनका संकेत उस सूर्य की ओर नहीं है जो बाहर है। उनका मतलब उस सूर्य से है जो हमारे भीतर है।
हमारे अंतस के सौर-तंत्र का केंद्र 'सूर्य ठीक प्रजनन-तंत्र की गहनता में छिपा हुआ है। कामवासना का केंद्र सूर्य होता है और उसमें एक प्रकार की ऊष्णता होती है। जब व्यक्ति कामवासना से थक जाता है तो तुरंत भीतर चंद्र ऊर्जा सक्रिय हो जाती है।अथार्त जब सूर्य छिप जाता है तब चंद्र का उदय होता है।
सूर्य ऊर्जा का काम समाप्त होने पर चंद्र ऊर्जा का कार्य प्रारंभ होता, भीतर की सूर्य ऊर्जा काम-केंद्र है। उस सूर्य ऊर्जा पर संयम केंद्रित करने से, व्यक्ति भीतर के संपूर्ण सौर-तंत्र को जान ले सकता है। काम-केंद्र पर संयम करने से व्यक्ति काम के पार जाने में सक्षम हो जाता है।
सभी रहस्यों को जान सकता है लेकिन बाहर के सूर्य के साथ उसका कोई भी संबंध नहीं हैलेकिन अगर कोई व्यक्ति भीतर के सूर्य को जान लेता है तो उसके प्रतिबिंब से वह बाहर के सूर्य को भी जान सकता है।सूर्य इस अस्तित्व के सौर-मंडल का काम-केंद्र है।
इसी कारण जिसमें भी जीवन है, प्राण है, उसको सूर्य की रोशनी, सूर्य की गर्मी को आवश्यकता है। जैसे कि वृक्ष अधिक से अधिक ऊपर जाना चाहते हैं।किसी अन्य देश की अपेक्षा अफ्रीका में वृक्ष सबसे अधिक ऊँचे हैं। कारण अफ्रीका के जंगल इतने घने हैं।
और इस कारण वृक्षों में वापस में इतनी अधिक प्रतियोगिता है कि अगर वृक्ष ऊपर नहीं उठेगा तो सूर्य की किरणों तक पहुँच ही नहीं पाएगा, उसे सूर्य की रोशनी मिलेगी ही नहीं। अगर सूर्य की रोशनी वृक्ष को नहीं मिलेगी तो वह मर जाएगा। जैसे सूर्य जीवन है; वैसे ही 'काम' भी जीवन है।
इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही है, और ठीक इसी तरह से सभी प्रकार के जीवन का जन्म 'काम 'से ही होता है। सूर्य लक्ष्य नहीं है, बल्कि केंद्र है। परम नहीं है, फिर भी केंद्र तो है। हमको उससे भी ऊपर उठना है, उससे भी आगे निकलना है। यह प्रारंभिक है ;अंतिम नहीं। यह ओमेगा नहीं है, अल्फा है।
जब पतंजलि हमें बताते हैं कि संयम को उपलब्ध कैसे होना; करुणा में, प्रेम में व मैत्री में कैसे उतरना ,प्रेमपूर्ण होने की क्षमता कैसे अर्जित करनी; तब वे आंतरिक जगत में पहुँच जाते हैं। पतंजलि की पहुँच अंतर-अवस्था के पूरे वैज्ञानिक विवरण तक है।
इस पृथ्वी के लोगों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, सूर्य-व्यक्ति और चंद्र-व्यक्ति, या हम उन्हें यांग और यिन भी कह सकते हैं। सूर्य पुरुष का गुण है। स्त्री चंद्र का गुण है। सूर्य आक्रामक होता है, सूर्य सकारात्मक है; चंद्र ग्रहणशील होता है, निष्क्रिय होता है।
यहाँ यह ध्यान रखना जरूरी है कि स्त्रैण गुण किसी पुरुष में भी हो सकते और पुरुष के गुण स्त्री में भी। सारे जगत के लोगों को सूर्य और चंद्र इन दो रूपों में विभक्त किया जा सकता है। और हम अपने शरीर को भी सूर्य और चंद्र में विभक्त कर सकते हैं।
योग ने इसे इसी भाँति विभक्त किया है। योग ने तो शरीर को इतने छोटे-छोटे रूपों में विभक्त किया है कि श्वास तक को भी बाँट दिया है। एक नासापुट में सूर्यगत श्वास है, तो दूसरे में चंद्रगता वास है जब व्यक्ति क्रोधित होता है, तब वह सूर्य के नासापुट से श्वास लेता है।
अगर शांत होना चाहता है तो उसे चंद्र नासापुट से श्वास लेनी होगी। योग में तो संपूर्ण शरीर को ही विभक्त कर दिया गया है : मन का एक हिस्सा पुरुष है, मन का दूसरा हिस्सा स्त्री है। और व्यक्ति को सूर्य से चंद्र की ओर बढ़ना है, और अंत में दोनों के भी पार जाना है, दोनों का अतिक्रमण करना है।
योग मात्र एक विज्ञान है। यह एक संयोगपूर्ण घटना ही है कि हिंदुओं ने योग को खोजा। लेकिन यह तो आंतरिक अस्तित्व का एक विशुद्ध गणित है। इसलिए कोई भी योगी हो सकता है। धर्म से ऊपर है योग। महर्षि पतंजलि बड़े कठोर गणितज्ञ हैं,और गणित की भाषा में ही बात करते हैं।
वे तुम्हें कुछ सूत्र देंगे। वे सूत्र संकेत मात्र हैं कि क्या करना है। वे ऐसा कुछ भी कहने का प्रयास नहीं करते, जिसे शब्दों में कहा न जा सके। वे असंभव के लिए प्रयत्न ही नहीं करते। वे तो बस नींव बना देंगे और यदि तुम उस नींव का आधार लेकर चल पड़े, तो उस शिखर पर पहुंच जाओगे ।
जो अभी सबके परे है। योग मृत्यु तथा नव जीवन दोनो ही है। तुम जैसे हो, उसे तो मरना होगा क्योकि जब तक पुराना मरेगा नही, नये का जन्म नहीं हो सकता। नया तुम में ही तो छिपा है। तुम केवल उसके बीज हो। और बीज को गिरना ही होगा, धरती में पिघलने के लिए।
बीज को तो मिटना ही होगा, केवल तभी तुम में से नया प्रकट होगा। तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हारा नव जीवन बन पायेगी। योग दोनों है -मृत्यु भी और जन्म भी। जब तक तुम मरने को तैयार न होंगे। तब तक तुम्हारा नया जन्म नहीं हो सकता।
यह केवल विश्वास को बदलने की बात नहीं है। योग तुम्हारे समग्र अस्तित्व से, तुम्हारी जड़ों से संबंधित है। वह दार्शनिक नहीं है।