रुपयों का संग्रह, खर्च और त्याग-HaryanaTv1
प्रवचन दिनांक 7 नवंबर 1993 प्रातः 5:00 बजे ।
*विषय - रुपयों का संग्रह, खर्च और त्याग ।*
प्रवचन के कुछ भाव, इस प्रवचन का ऑडियो कल रात्रि भिजवाया गया था । इन भावों को समझने के लिए इस प्रवचन को जरूर सुनना चाहिए ।
*हमारे परम श्रद्धेय स्वामी जी* *श्री रामसुखदास जी महाराज जी की वाणी बहुत विलक्षण है, दिव्य (परम वचन) है, श्री* *स्वामी जी महाराज जी की वाणी सुनने से हृदय में प्रकाश आता है । इसलिए प्रतिदिन* *जरूर सुननी चाहिए ।*
परम श्रद्धेय स्वामी जी महाराज जी कह रहे हैं कि समय को कीमती नहीं समझा । रुपयों को कीमती समझा है । समय देकर रुपया खरीदा जा सकता है । रुपया देकर समय नहीं खरीदा जाता । अगर रुपयों से समय खरीदा जाता तो धनी आदमी नहीं मरते । इससे सिद्ध होता है कि रुपयों से समय कीमती है ।
दान देने से लोगों को सहायता मिलती है, उपकार होता है, धन का महत्व है, रुपयों के द्वारा उपकार हुआ तो रुपयों के कारण हुआ, तो रुपया बेठीक कैसे हुआ ? यह प्रश्न है ।
स्वामी जी - रुपयों के द्वारा उपकार समझना है तो रुपयों का लोभ होता है । जबकि महत्व भगवान् का है । रुपयों के द्वारा उपकार होता है, रोगी को दवाई मिल जाती है, असहाय को सहायता मिल जाएगी, तो यह भौतिक लाभ ही तो हुआ । कल्याण कहां हुआ ! दु:ख कहां मिटा ! शांति कहां मिली ! भगवान् की तरफ रुचि करा देना बहुत महत्व की बात है । रुपयों का महत्व समझने से संसार का ही महत्व होगा । शास्त्रों में आया है कि दान करने के लिए भी रुपया कमाने की जरूरत नहीं है । कादा लगाकर धोना बढ़िया है क्या ? जितना कादा लगाया है, उतना ही पानी से कादा साफ हो जाएगा क्या ? दस गुना पानी चाहिए, तब कादा साफ होगा । रुपया कमाने से जो पाप, अन्याय कमाया है, वो साथ जाएगा । पाप, अन्याय अंतःकरण में अंकित हो गया और रुपया साथ जाएगा नहीं । चोर चोरी करता है तो कमाया हुआ रुपया चोरी करता है । अंतःकरण में अंकित झूठ, अन्याय की चोरी नहीं करता । रुपयों से रद्दी चीज कोई है ही नहीं । विष्ठा भी खुद काम आती है (सूअर आदि खाते हैं) रूपया खुद क्या काम आता है ? रुपयों के कारण बड़े-बड़े पाप करता है । संतति निरोध करता है । बच्चे पैदा नहीं करता है । मैं दान को बुरा नहीं समझता हूं । पर दोनों - दान और कल्याण को मिलाकर देखा जाए तो कल्याण श्रेष्ठ है । जड़ता से जड़ता की सेवा करके त्याग करके कल्याण करना श्रेष्ठ है । मानो रुपयों का त्याग (दान) रूपयों से संबंध विच्छेद होने का लाभ है । रुपयों का लाभ नहीं है । जिससे महान सुख हो जाए, जन्म मरण मिट जाय । सुख रुपयों से कैसे होगा । रुपए से भौतिक सुख हो जाएगा (खर्च करे तो) । वास्तविक उपकार को समझ जावे तो जन्म मरण क्यों हो ? महत्व जड़ता का है । उत्पन्न और नष्ट होने वाली का क्या महत्व है ? आज लोग कहते हैं - अर्थार्थी भक्त है । तो वह झूठ, कपट, बेईमानी, कालाबाजारी देवता के भक्त हैं । इनका आश्रय लिया है । और धन कमाते हैं वो आदमी बड़े माने जाते हैं । भगवान् में लगना चाहिए । कुएं में भांग पड़ी है । क्या साधु ! क्या गृहस्थ ! सबका लक्ष्य रुपया ही बन गया । तो सुख, कल्याण समझ में कैसे आए!
एक तरफ धन है, एक तरफ धन का खर्चा है, मिलान करो । धन जब काम आवेगा, खर्च से ही काम आएगा । आपके भी तभी काम आवेगा, दूसरों के भी तभी काम आएगा । धन का संग्रह अभिमान पैदा करता है । त्याग से शांति मिलती है । धन से आसुरी संपत्ति बढ़ी कि दैवी संपत्ति बढ़ी । ज्यादा धन वाले के ऊपर राज्य की, चोर की, साधु की, ब्राह्मण की, बेटे - बेटी सब की दृष्टि रहती है । धनी पर सबकी निगाह रहती है । धनवान के यहां काम करने वाले कहते हैं - कि सेठ के पास धन तो हो गया, पर अक्ल नहीं है । देखो सार बात बतावें रुपयों का सदुपयोग बढ़िया है, ऐसे समय का सदुपयोग बढ़िया है । हरेक चीज का सदुपयोग हो । मनुष्य शरीर की महिमा बताई है, उससे नरक में भी जा सकता है और स्वर्ग में भी जा सकता है । तो क्या नरक की महिमा है । महिमा मनुष्य शरीर (विवेक की) है । जिससे अपना कल्याण कर ले । उपकार भी सदुपयोग से ही होगा ।
नोट: यह संदेश व्हाट्सएप से प्राप्त है।
👏👏